आखिर जब इंसानियत ही लिखी है गीता और क़ुरान में तो, फिर ये झगड़ा कैसा है?: शशी प्रताप सिंह

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वाराणसी/संसद वाणी

आज का दिन हिंदू और मुस्लिम भाइयों को लिए साझा रूप से एक साथ त्योहार मनाने वाला दिन है , एक ओर मुसलमान भाई 1 महीने के रोजा के बाद ईद उल फितर का त्यौहार मना कर तो दूसरी तरफ हिंदू भाई पावन पर्व अक्षय तृतीया का त्यौहार मना रहे हैं , देखा जाए तो पिछले 2 वर्ष में भयावह कोरोना काल के वजह से ना तो ईद उत्साह से मन सकी और न अक्षत तृतीया। इस बार दोनों पर्वों को लेकर लोगों में उत्साह है। ईद पर कपड़े, सेवईयां ,ड्राई फ्रूट्स, सजावटी व इलेक्ट्रानिक सामान की खरीद होगी, जबकि अक्षय तृतीया पर नए वाहन ,सोना-चांदी, घर-जमीन की खरीदारी की जाएगी। अक्षय तृतीया के दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं, उनका फल भी अक्षय मिलता है। ऐसे में मान्यता के अनुसार ज्यादातर लोग आभूषणों की खरीदारी करते हैं, इसमें विशेषकर लोग सोने के आभूषण खरीदना पसंद करते हैं।
सुभासपा के प्रदेश प्रवक्ता शशी प्रताप सिंह ने इस मौके पर प्रदेशवासियों को शूभकामनांए दी हैं. उन्होंने आपसी सौहार्द बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि”गंगा-जमुनी संस्कृति ही हमारे समाज की विशेषता रही है। हिदू-मुस्लिम एकता ही समाज की सुंदरता है ,रमजान ईद के मौके पर मैं मुस्लिम धर्मावलंबियों से आह्वान करता हूं कि वे प्रदेश की खुशहाली, सौहार्द, सद्भावना और अमन चैन की दुआ करें . भाईचारे की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए , सामाजिक सद्भाव को और मजबूत करते हुए एक-दूसरे की मदद करें .जिस प्रकार बिना दो हाथों के ताली नहीं बजाई जा सकती है, ठीक उसी प्रकार हिदू-मुस्लिम एकता के बिना सुंदर समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है
अक्षय तृतीया का अवसर सुख-समृद्धि को बढ़ाने वाला माना जाता है . अक्षय तृतीया को हिंदू धर्म में बहुत ही शुभ और मंगलकारी तिथि माना गया है। अक्षय तृतीया एक अबूझ मुहूर्त है यानी इस तिथि पर कोई भी शुभ कार्य बिना मुहूर्त देखे किया जा सकता है।हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया का पर्व दान-पुण्य के कर्म के लिहाज से बहुत उत्तम होता है. हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए पुण्य कर्मों का क्षय कभी नहीं होता।

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