अनुदान राशि के लिए भटकते राजस्थानी फिल्मों के निर्माता

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  • रामस्वरूप रावतसरे
  • राजस्थान/संसद वाणी।


राजस्थान कांग्रेस ने 2018 के विधान सभा चुनावों में अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा था कि राजस्थानी भाषा में फिल्म निर्माण करने वाले निर्माताओं को प्रोत्साहन स्वरूप 25 लाख रूपये का अनुदान देगी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदेश के तीन बजट पेश किये लेकिन चुनावी घोषणा पत्र के अनुसार राजस्थानी भाषा में निर्मित फिल्मों के लिए किसी प्रकार के अनुदान बजट की घोषणा नहीं की। जब फिल्म निर्माताओं ने उन्हें चुनावी घोषणा पत्र की याद दिलाई तब जाकर चौथे बजट में राजस्थानी भाषा फिल्म निर्माताओं को प्रोत्साहन स्वरूप अनुदान राशि दिये जाने की घोषणा की गई । मुख्यमंत्री की बजटीय घोषणा को अमल में लाने के लिए जिस प्रशासनिक तन्त्र को नियुक्त कर रखा है। वह बजटीय घोषणा पर अपनी कुण्डली लगाकर बैठा है।
फिल्म निर्माता राजेन्द्र सिहं शेखावत के अनुसार राजस्थानी भाषा, कला, संस्कृति को लेकर बनने वाली फिल्मों के प्रोत्साहन लिए प्रदेश में मंत्री, मंत्रालय और अफसर नियुक्त हैं, ये सभी सरकार से मोटा वेतन पाते हैं, राजस्थानी फिल्मों के लिए प्री व्यू कमेटी भी बनी हुई है, फिर भी राजस्थानी फिल्मों को समय पर अनुदान नहीं मिल रहा है। फिल्म निर्माता निर्देशक शेखावत के अनुसार उनके द्वारा चन्द्र फिल्म्स प्रोडक्शन के बैनर तले बनाई गयी राजस्थानी भाषा की फिल्म ’’बावळती’’ को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से ’’यू’’ प्रमाण पत्र मिला हुआ है। इस फिल्म को 22 सितंबर 2021 को सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ कला एवं संस्कृति विभाग सचिवालय जयपुर में जमा करवा दी थी। कला एवं संस्कृति मंत्री बी डी कल्ला ने नवंबर माह में उप समिति का गठन करके 11 दिसंबर 2021 तक फिल्मों का प्री व्यू देखने के निर्देश भी दिए थे।

इतना सब होने के बाद भी आज तक अनुदान मिलना तो दूर, उप समिति द्वारा फिल्मों का प्री व्यू तक नहीं देखा गया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कला एवं संस्कृति मंत्री बी डी कल्ला के सभी आदेश व निर्देशो पर अफसरशाही कुण्डली मार कर बैठी है। राजस्थानी फिल्म निर्माताओं द्वारा बार बार मुख्यमंत्री और मंत्री को निवेदन करने पर आदेश तो दिये पर उन आदेशों का आगे क्या हुआ इसकी कोई सुध नहीं ली है। यदि मुख्यमंत्री और मंत्री इस ओर ध्यान देते तो राजस्थानी फिल्मों को दिसंबर 2021 में ही अनुदान राशि जारी हो जाती।

इस संबंध में कला एवं संस्कृति विभाग के अनुभागाधिकारी से फिल्म निर्माता मिले तो उन्होंने इतना कह कर बात को समाप्त कर दिया कि समिति की बैठक नहीं हो रही है। ये ही बात उप समिति के मेंबर के सी मालू कह रहे हैं कि प्री व्यू समिति की बैठक नहीं हो रही है। बैठक कौन कराएगा यह भी समझ में नहीं आ रहा है। राजस्थान के मुख्यमंत्री और मंत्री के आदेश के बाद भी समिति, उप समिति की बैठक नहीं होना भी कई प्रकार के प्रशन खडे करता है। इनकी नकारात्मक कार्य प्रणाली से इस बात को भी बल मिलता है कि राजस्थानी भाषा, कला व संस्कृति को लेकर प्रशासनिक एवं राजनीतिक स्तर पर जिम्मेदार लोग कैसी मनोवृति को पाले हुए है।

राजस्थान में राजस्थानी भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा बनाने के लिए बरसों से प्रयासरत संगठनों को आज तक सफलता नहीं मिलने के पीछे भी हमारा शासन तन्त्र है जो राजस्थानी भाषा एवं संस्कृति के मुद्दे पर आंखें मूंदने के साथ साथ कानों को भी बन्द कर लेता है। चुनावों के समय इस प्रकार के मुद्दे उठाये जाते है। लेकिन सत्ता में आने के बाद ऐसे मुद्दे गोण कर दिये जाते है।

राजस्थानी फिल्मों को समय पर अनुदान राशि जारी नहीं होने से फिल्म निर्माता बहुत परेशान हैं। उनके सामने आर्थिक संकट की विकट स्थिति है। साथ ही सरकार की घोषणाएं भी झूठ का पुलंदा साबित हो रही हैं। निर्माता निर्देशक राजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी राजस्थानी फिल्मों को प्रोत्साहन स्वरूप अनुदान देने के नाम पर 10 लाख की घोषणा की थी। भाजपा शासन में प्रशासनिक स्तर पर लम्बी जद्दोजहद के बाद 3 लाख का अनुदान मिला। पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे की अनुदान देने की घोषणा 70 प्रतिशत झूठी निकली, लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा की गई 25 लाख की घोषणा अभी तक 100 प्रतिशत झूठ है। क्या इनकी नीति और नीयत जनता को झूठे आश्वासन देने की ही रह गई है।

अब जानकारी में आया है कि कला एवं संस्कृति मंत्रालय राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थानी फिल्मों को अनुदान देने के लिए नई नीति बनाई है उसके अनुसार कार्य होगा। यह सरकार नीति और नियम बनाने में ही अपना समय पूरा कर देगी। जैसा कि पहले होता आया है। तीन साल बीत ही चुके है। ये सरकार में बैठे लोग किसी प्रकार के अनुदान को देने में नियम, उप नियम का ऐसा मकड़ जाल बनाते है कि अनुदान लेने वालों की हिम्मत टूट जाती है, पर अनुदान नहीं मिलता। यदि किसी मंत्री के सरकारी बगंले में रंग रोगन कराना है या फर्निचर लगाना हो तो सारे नियम कानून विभाग की चौखट पर ही दुबक जाते है। लाखों करोड़ों के बिल बिना रोक टोक के विधुत की गति से आगे बढते है। ऐसे ही राजस्थान सरकार अपने विधायकों को बिना मांगे ही करोड़ों के आई फोन खरीद कर देने की हिम्मत जुटा सकती है। लेकिन गिनी चुनी राजस्थानी फिल्मों को अनुदान देने के लिए कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा समिति उप समिति का गठन करने के बाद भी राजस्थनी फिल्म निर्माताओं के हाथ खाली है।

राजस्थानी फिल्म निर्माताओं के लम्बे इंतजार के बाद अब कला एवं संस्कृति मंत्री बी डी कल्ला ने राजस्थानी की 17 फिल्मों में से सिर्फ 6 को ही अनुदान देने की घोषणा की है। अनुदान से वंचित 11 फिल्मों के निर्माताओं को तीन साल भागदौड़ करने पर भी निराशा ही मिली हैं। ग्यारह फिल्मों को अनुदान नहीं देने का निर्णय राजस्थानी सिनेमा का कोई हितैषी तो नहीं ले सकता है। यह निर्णय तो राजस्थानी सिनेमा को खत्म करने के विचार वाले ही ले सकते हैं। निर्माता निर्देशक राजेन्द्र सिहं शेखावत के अनुसार राजस्थानी भाषा की फिल्म ’’बावळती’’ सहित 11 फिल्मों को अनुदान राशि नहीं दिया जाना मुख्यमंत्री को बदनाम करने की साजिश भी हो सकती है। बजट घोषणा के बाद भी अनुदान नहीं देने का जवाब तो मुख्यमंत्री को ही देना होगा। मंत्री या सचिव को नहीं। शेखावत ने कहा कि ’’बावळती’’ जैसी फिल्म को अनुदान से वंचित रखा जाने से लगता है, जिम्मेदार लोगों ने फिल्मों को देखा ही नहीं है। या फिर सरकार गांधी जी और राजस्थानी भाषा, संस्कृति के झूठे गीत गाती है। फिल्म ’’बावळती’’ को मुख्यमंत्री जी खुद देंखे तो पूरी हकीकत सामने आ जाएगी।

पाश्चात्य आबोहवा के चलते स्थानीय भाषा और संस्कृति में फिल्म का निर्माण बहुत बड़ा जोखिम होता है। लेकिन अपनी भाषा एवं सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण रखने के लिए राजेन्द्र सिहं शेखावत जैसे कुछ उत्साही व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर होते हुए भी ये जोखिम उठाते है। इनके लिए सरकारी संरक्षण बहुत जरूरी है। ऐसे में प्रदेश गहलोत सरकार को चाहिए कि बिना किसी राजनीतिक लाभ हानि के ऐसे लोगों का समय समय पर उत्साहवर्धन के साथ आर्थिक सहयोग भी करें।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 2022-23 के बजट में प्रदेश की जनता के लिए बहुत सी घोषणाएं की है, उसमें एक घोषणा राजस्थानी भाषा की फिल्मों को अनुदान देने की भी है। सरकार और सम्बन्धित मंत्री से उम्मीद की जा सकती है कि इस घोषणा पर भी बिना किसी भेदभाव के सकारात्मक रूप से जल्द ही सभी राजस्थानी फिल्म निर्माताओं के पक्ष में निर्णय होगा।

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